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पुण्याहवाचन

द्वारा प्राचार्य

ओ३म् | सहनाववतु | सह नौ भुनक्तु | सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्विनावधीतमस्तु | माविद्विषावहै | कठोपनिषद् |
            विद्या का 'दान' परम-पवित्र ईश्वरीय कार्य है । विद्यार्थी को विद्याध्ययन प्रारम्भ करने से पूर्व विद्यादेवी की आराधना करनी चाहिए, साथ ही उक्त वैदिक प्रतिज्ञा भी करनी चाहिए कि हम दोनों (गुरु और शिष्य) परमार्थ हेतु शिक्षा के कार्य में प्रवृत्त होंगें और प्रेमभाव से समत्त्व का जीवन जीते हुए एक दूसरे की रक्षा करेंगें, किसी भी प्रकार की ईर्ष्या-द्वैष की भावना मन में भी नहीं आने देंगें | सदा सद् आचरण का पालन करेंगें | साथ ही शिष्यों को विशेष विनम्र होकर समर्पण भाव से श्रद्धा पूर्वक आचार्यों की सेवा करते हुए गुरु के उपदेशों का अक्षरशः पालन करना चाहिए | यही ज्ञान प्राप्ति का सरलतम उपाय है |

           जो सन्त प्रकृति के जिज्ञासु शिष्य होते हैं वे सहज ही शीघ्रता से ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं और ईश्वर की उनपर विशेष कृपा होती है जिससे वे तेजस्वी, जितेन्द्रिय, वीर्यवान, ज्ञानवान विद्वान् हो जाते हैं | नीतिशास्त्र भी विद्या के सम्बन्ध में ऐसा ही कहते हैं | विद्या के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहा जाता है कि "विद्या धनं सर्व धन प्रधानम्" | विद्या धन की विशेषता बताते हुए यह भी कहा जाता है कि जितना ही विद्या को खर्च करोगे, विद्या उतनी ही बढ़ती जाएगी | अतः अध्ययन-अध्यापन और स्वाध्याय में कभी भी प्रमाद नहीं करना चाहिए और जीवन के अन्तिम क्षणों तक विद्यार्थी बने रहना चाहिए | वस्तुत:शिक्षा प्राप्त करना मानव का मौलिक अधिकार है और ज्ञान मानव की अदृश्य सम्पत्ति है अत: उसके संरक्षण संवर्धन में सहयोग देना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है |

           यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि शिक्षण का कार्य जननी के गर्भ से ही प्रारम्भ हो जाता है | माता शिशु की प्रथम शिक्षिका एवं गुरु होती है तथा परिवार प्रथम पाठशाला |

           नवजात शिशु भी अपने साथ अनेक जन्म जन्मान्तरों के संस्कार लेकर आता है और बढ़ाते हुए भविष्य के साथ समाज और देश की सभ्यता, संस्कृति से भी संस्कारित होता रहता है | अत: सद् संस्कारो के लिए आवश्यक है कि घर में पवित्र वातावरण हो, माता पिता, गुरु आचार्य चरित्रवान, धार्मिक, कर्तव्यपरायण हों, जिन्हें सामाजिक मर्यादाओं का केवल ज्ञान ही न हो अपितु वे स्वयं मर्यादा का पालन भी करते हो, क्योंकि बच्चों पर उपदेश का प्रभाव कम होता है, वे अनुकरण से ही शिक्षा ग्रहण करते हैं  | नीति भी कहती है कि महाजनों येन गताः सः पन्थाः | श्रेष्ठ जनों का अनुकरण ही सामाजिक परम्परा बन जाती हैं |

           ज्ञान के अनन्त आयाम हैं | केवल साँसारिक जानकारी प्राप्त करना ज्ञान नहीं है | वह तो अज्ञान अविद्या का निष्फल स्वरूप है | ज्ञान वह पवित्र शक्ति है जिससे विवेक जागता है वस्तुतः ईश्वरीय ज्ञान आत्मा से प्रकट होता है ज्ञान के विषय में कहा है कि " न हि ज्ञानेन सदृश्यं पवित्रमिह विद्यते " नि:संदेह ज्ञान के समान मनुष्य को पवित्र करने वाला संसार में दूसरा कोई साधन नहीं है | और यही ज्ञान रूपी अग्नि समस्त कर्मो के बन्धन रूप फल को भस्मी भूत कर देती है | अत : मनुष्य का कल्याण इसी में है कि वह शिष्यत्व भाव से जिज्ञासु हो कर तत्त्व दर्शी ज्ञानियों की शरण में जाकर ज्ञान प्राप्ति का निवेदन करें | गुरुओं के अनुशासन में रह कर सेवा भाव से ज्ञान का पालन करते हुए, श्रद्धावान, जितेन्द्रिय संयमी होकर, सरलता से प्रश्न करते हुए, संसार के द्वन्द्वात्मक, स्वरूप से मुक्त होने का उपाय पूछें | जिससे ज्ञान का सत्य स्वयं प्रकट हो |

           शास्त्र कहते है कि जीवन का आधार सत्य है | सत्य का आधार है ज्ञान और ज्ञान का आधार है वह स्वयं ज्ञानवान, ज्ञान-स्वरूप सच्चिदानन्द धन परब्रम्ह परमेश्वर | सत्य यह है कि  उसी कि कृपा से दुख दूर होते हैं और भगवंतकृपा विश्वास से प्राप्त होती है | शरणापन्न होते ही भक्ति, शक्ति, मुक्ति और विरक्ती  स्वयं ही प्राप्त हो जाती है | अत: साधक को श्रद्धा प्रेम विश्वास से युक्त होकर प्रेममय जीवन जीना चाहिए | जिसने ज्ञान के परम सत्य को जान लिया हैं वही ज्ञानी हैं | मनुष्य इसी परम ज्ञान के आधार पर संसार में रहते  हुए भी संसार में नहीं रहता उस ज्ञानी का जीवन ब्रम्हमय हो जाता है जिसे गीता में कहा है -
ब्रहापर्णं ब्रम्हाहवि ब्रम्हंनौ ब्रम्हाणाहुतम
ब्रम्हौव तेन गन्तव्यं ब्रम्ह कर्म समाधिना |
परम संत ज्ञानी के लिए सभी कर्म यज्ञमय ब्रम्ह हो जाते हैं |

           उसके लिए यज्ञशाला भी ब्रम्ह है, यज्ञ के सभी साधन ब्रम्ह हैं | यज्ञ का फल भी ब्रम्ह है ईश्वरको सब कुछ समर्पित है ऐसे ही महापुरुष  ज्ञान देने अधिकारी होते हैं उन्हें आदर से प्रणाम करते हुए कहा जाता है -
 गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोः महेश्वरः |
गुरुः साक्षात्परं ब्रम्ह तस्मै श्री गुरवे नमः ||
           अन्त में ज्ञान यज्ञ हेतु मैं बच्चूलाल रामदुलारी महाविद्यालय बीसवाँ सीतापुर के समस्त कर्मचारियों, विद्यार्थियों, विद्वान्, प्राध्यापकों एवं प्रबन्ध समिति के सदस्यों और माननीय प्रबन्धक महोदय डाँ कृष्ण गोपाल मिश्र को  हार्दिक शुभकामनायें व्यक्त करते हुए आशा करता कि महाविद्यालय रूपी ज्ञानयज्ञ में तन, मन, धन की आहुतियाँ  सदा देते रहेगें ऐसी मेरी शुभेच्छा है ।

आभार सहित आपका
डा० महेंद्र कुमार शुक्ल
बी० एल० आर० डी० डिग्री कालेज विसवाँ सीतापुर
विक्रम संवत 2069
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
नव वर्ष की
शुभ मंगल वेला में आपके साथ
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