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महाविद्यालय नीव से शिखर तक

जीवन का प्रत्येक कार्य परम प्रभु परमेश्वर के द्वारा सुनिश्चित और निर्देशित होता है | कार्य सम्पादन हेतु वह स्वयं व्यक्ति का निर्माण करता है और उसे योग्यता तथा प्रेरणा प्रदान कर कार्य करवाता है, ऐसा कुछ मेरे साथ भी हुआ | 1974 में विजयादशमी के दिन बिसवाँ नगर में चिकित्सालय प्रारम्भ करने के उपरान्त राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नाते तथा आपातकाल में किये गये अनेक साहसिक कार्यो के कारण विसवां नगर के अनेक लोग मेरे निकट सम्पर्क में आये, जिनमें श्री भवानीदीन जी के सुपुत्र श्री बच्चूलाल जी प्रातः स्मरणीय है | आपकी पत्नी मेरी धर्म माता रामदुलारी जी का स्नेह मुझे आज भी ममता से ओत प्रोत भावुक कर जाता है | आप दोनों ने मुझे पुत्रवत स्नेह देते हुए महाविद्यालय खोलने का महान दायित्व सौपा | मैं भी बिसवाँ में उच्च शिक्षा के अभाव से द्रवित था, इसे परम सुयोग ही कहा जायेगा कि भूमि प्रदाता ने कार्य को प्रारम्भ करने के लिए पचास हज़ार रुपये भी दान दिये, ईश्वर की इच्छा से तत्कालीन क्षेत्रीय सांसद माता श्रीमती राजेन्द्र कुमारी वाजपेयी, जो उस समय केंद्र सरकार में समाज कल्याण मंत्री थी आप ने श्री बच्चूलाल रामदुलारी महाविद्यालय का भूमिपूजन से लेकर शिलान्यास तक अपना अमूल्य योगदान देते हुए आशीर्वाद देकर हम सब को स्नेह सूत्र में बांधा और पुत्रवत स्नेह दिया |

महाविद्यालय के निर्माण काल में अनेक बाधायें आयी, मैंने ईश्वर का सहयोग लेकर इस ज्ञान यज्ञ में अपने जीवन के आहुति देकर भी इसे सफल बनाने का प्रयास निरन्तर जारी रखा | कार्यं वासधेयम् देहं वा पातेयम् के उदघोषक वीर शिवाजी के मूल मन्त्र को अपना ध्येय वाक्य शिरोधार्य कर लिया फलतः ईश्वर की अनुकम्पा से शीघ्र सफलता प्राप्त हो गयी | भवन बना और प्रारम्भ में महाविद्यालय को अस्थाई मान्यता मिली, परन्तु बहुत ही शीघ्र दि. 01-07-1995 को स्थायी मान्यता भी कानपुर विश्वविद्यालय से प्राप्त हो गयी | दि. 03-11-1985 से अद्यावधि में इस विद्यादान के यज्ञ में अपने श्रम और समय की आहुतियाँ प्रदान कर रहा हूँ | आप सबका आशीष मुझे प्राप्त है इसलिए मैं अपना कार्य प्रसन्नता से सम्पन्न कर पा रहा हूँ |

अतः निर्माण के संघर्ष काल में मेरे उर मंथन से कुछ पंक्तियाँ निकली जो मेरी जीवन शक्ति और लक्ष्य को प्राप्त करने का सम्बल बनी :-

धान्य सभी कण अंकुर पाकर, धरती ऊपर लहराते हैं |
शक्ति-सौष्ठव जिनमे होता, धरती फोड़ निकल आते हैं |
आतप-आंधी और कुहासा, सीना तान झेल जाते हैं |
फिर पचांग रूप पा करके, पञ्च तत्व में मिल जाते हैं |
जीवन चक्र यही है चलता, पौधे बने पुनि-पुनि खिलते हैं |
जब तक हव्य नही बनते है, तब तक मोक्ष नही पाते हैं |

अपने सभी सहयोगियों को कोटिशः धन्यवाद, जिन्होंने पुनीत कार्य में अपना योगदान देकर मुझे सम्बल दिया |

डा के.जी, मिश्र
प्रबन्धक